एक पाठक धूप से भरी लाइब्रेरी में पुरानी किताब खोलता है। पन्ना पलटते ही शब्द सचमुच काग़ज़ से उठ जाते हैं। स्याही पंख बनती है। वाक्य पर फड़फड़ाते हैं और पक्षी बन जाते हैं। झुंड प्रकाश किरणों में सर्पिल होकर रोशनदान की ओर चढ़ता है। पन्ने कोरे रह जाते हैं, और लाइब्रेरी कहानियों के जीवन से भर जाती है। कैमरा: पन्ने के क्लोज़-अप से रोशनदान के पैनोरमा तक। प्रकाश: लाइब्रेरी की किरणें। शैली: साहित्यिक जादुई यथार्थवाद। अवधि: 12 सेकंड।